Sunday, January 30, 2011

दूसरा न कोई


एकाएक थकान क्यों महसूस हुई? अगर मन की थकान को शरीर की थकान का कारण माना जाये तो महसूस होना चाहिए न, कि अमुक वारदात की वजह से सवेदनाएं झकृत हो गई और इसलिए पहले मन फिर शरीर पर असर हुआ। ऐसी कोई घटना नहीं हुई जो मन को क्लान्त करे। कुछ दिन पहले पड़ोसी के बेटे को नौकरी मिली थी, इस उपलक्ष्य में चुनिन्दा लोगों को दोपहर भोज के लिए आमत्रित किया गया था। कपड़े बदले और अपने घर से निकलकर पड़ोस में चला गया। कोई बोझ या तनाव नहीं। यातायात का दबाव नहीं। ट्रैफिक सिग्नलों का झझट नहीं। प्रदूषण नहीं। गर्मी का प्रकोप नहीं। मुश्किल से एक मिनट लगा होगा पहुचने में। परिचित कोई नहीं था वहा। दस-बारह लोग कुर्सियों का झुरमुट बनाकर बैठे गपशप कर रहे थे। पड़ोसी महाशय ने वहा ले जाकर बैठाया, औपचारिक रूप से परिचय कराया और अपने काम-धधे से लग गये। कभी सेवानिवृत्ति के बाद किये जा रहे कार्यकलापों, कभी जमाने की तेजी से रफ्तार पकड़ती गति और कभी राजनीतिक परिदृश्य। चर्चा के विषय यही थे। मैं इनमें से प्रत्येक विषय पर विचार व्यक्त करने की स्थिति में था मगर अपरिचितों के बीच होने के कारण मुझे बोलने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
होठों से मुस्कराहट चिपकाये मैं आधा-पौन घटा वहा बैठा। सबके साथ भोजन किया। घर पहुचा तो लगा, बहुत थक गया हूं। क्या किया मेरे शरीर ने ऐसा कि थकान महसूस होने लगी? भोजन करने के लिए ग्रास उठाना, ग्रास को थाली से मुंह तक ले जाना, हाथ को वापस नीचे ले आना, मुंह में डाले गये ग्रास को चबाना, भोजन के बाद पानी पीना, उठकर हाथ धोना, कुल्ले करना, जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछना, ये सब ऐसे काम थे क्या कि शरीर थक जाये? बोला नहीं था। बहस नहीं हुई थी किसी से। दिमाग पर कोई दबाव नहीं था। दूसरे लोगों की बातें, उनके तर्क-वितर्क सुनकर मन ही मन गलत-सही जरूर ठहरा रहा था बोलने वालों को। मगर एक बार भी पक्ष नहीं बना। जुबान खोलकर न किसी बात का समर्थन किया और न विरोध। होठों की मुस्कराहट को आधार मानें तो मैं बातों का मजा ले रहा था। मन को अप्रिय लगे, ऐसा कुछ नहीं था वहा। भोजन ऐसा नहीं था कि जायका खराब कर दे। मान-सम्मान में कमी नहीं थी। मालूम नहीं कि पड़ोसी होने के नाते या निकटता के कारण मगर पूरी कालोनी में से अकेले हमें आमत्रित किया गया, अन्दर ही अन्दर गौरवानुभूति थी। इन स्थितियों में न मन को थकना चाहिए, न तन को। फिर भी थकान महसूस हो रही है तो क्यों?
कुछ दिन पहले कर्मचारी सघ में साथ काम कर चुके और लगभग दस साल पहले सेवानिवृत्त हुए एक मित्र को दिल्ली से आना था। घर मिलने आया। मैं तपाक से गले मिला। गर्मजोशी से स्वागत किया। खुलकर बातें की। दो-तीन पुराने नेता साथ थे उनके। जाते-जाते एक ने कहा भी, ''देखकर खुशी होती है कि सेवानिवृत्ति ने आपके ऊपर कोई विपरीत असर नहीं डाला है। आप उतने ही चुस्त-दुरुस्त है जितने पहले हुआ करते थे।'' मैं ठहाका लगाकर हस दिया था। लौटने के कोई एक घटे बाद मित्र का फोन आया, बाकी लोग साथ थे इसलिए उस समय पूछा नहीं। सब कुछ ठीक है न?
''ठीक तो है सब कुछ, आपको गलत लगा क्या?''
''गलत तो नहीं, मगर कुछ ठीक भी नहीं लगा।''
''कैसे? कैसे कहते है आप यह बात? मेरे व्यवहार में कोई बदलाव था?''
''ऊपर से तो सब कुछ ठीक था। मगर लगातार महसूस हो रहा था कि तुम पहले वाले व्यक्ति नहीं हो।''
''नहीं-नहीं। मैं वैसा ही हू, जैसा पहले हुआ करता था। एक साथी ने आपके सामने यह बात कही भी थी।''
''हा, कही थी। मगर तुम जितना भी बनो, सच्चाई मुझसे छिपा नहीं सकते।''
''क्यों छिपाऊंगा सच्चाई आपसे, बताइये?''
''दूसरे लोग साथ थे इसलिए हो सकता है, मन को खोलना ठीक न लगा हो तुम्हे!'' मैंने नकली ठहाका लगाया, ''ऐसी कोई बात नहीं है। आप निश्चिन्त रहिये।''
''ठीक है, तुम कहते हो तो मान लेता हू।'' उन्होंने ठहराव के साथ कहा।
किसी से क्या कहू? किसी को क्या बताऊं? मुझमें परिवर्तन आया है। मेरी साम‌र्थ्य, काम करने की शक्ति, शरीर और मन की ताकत कम हुई है। अहसास के बावजूद न मुझे इसका कारण मालूम है और न मैं इसे स्वीकार करने की मन:स्थिति में हूं। बेफिक्री, चुस्ती, हाजिर, जवाबी, चुनौती स्वीकार करने की प्रवृत्ति कुंद होने के सकेत गम्भीरता से मानने को तैयार नहीं हू।
पहले जितना प्रफुल्ल नहीं रहता हूं। कारण? शायद प्रफुल्लता का वातावरण नहीं है चारों ओर। एकरसता में दिन उगता है और एकरसता में डूब जाता है। किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में जो सामग्री पढ़ता हू, उसमें नयापन होता है। ऐसा बहुत कुछ पढ़ने को मिल जाता है जो मेरी जानकारियों में इजाफा करता है। असहमति की स्थिति में सोच जिन बिन्दुओं से साक्षात्कार कराता है, उससे मौलिकता का अहसास जागता है। ज्ञान में वृद्धि और चिन्तन का विस्तार सयुक्त रूप से मुझे समृद्ध बनाते है। किन्तु पढ़ना, पढ़ना और सिर्फ पढ़ना आखिर कब तक पढ़े कोई? कई बार पढ़ने की इच्छा नहीं होती। ऊब कर टीवी देखने लगता हू या सीडी लगाकर देखने, सुनने लगता हू। एकाध घन्टे में मन उससे भी भर जाता है। समझ में नहीं आता, क्या करूं? कैसे समय व्यतीत करूं?
जीवन भर जिन गतिविधियों में सलग्न कर रहा हू, उनके कारण महत्व मिलता रहा है। महत्व का स्वाद मन में निरन्तर बना रहा है। उस जायके के चलते वैशिष्ट्य बोध का एक घेरा नजर न आते हुए भी खुश्बू की तरह अनुभव करता रहा हू।
महत्व प्राप्ति की लालसा थी तो उस रास्ते को क्यों छोड़ा जिस पर चलकर इच्छित मिलता था?
सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी सघ में पद पर बने रहना सभव नहीं था तो सलाहकार के रूप में ही सही, सक्रिय रहा जा सकता था। कुछ दिन पहले जो मित्र दिल्ली से आये थे, किसी न किसी रूप से जुडे़ हुए है न कर्मचारी सघ से? मुझे तो केवल दो साल हुए है, वे पिछले दस वर्षो से अपनी उपस्थिति को दर्ज करा रहे है। मुझसे मिलने आते समय कर्मचारी सगठन के दो-तीन पुराने नेताओं का साथ होना इस बात का प्रमाण था कि उनका महत्व बरकरार है। मेरे लिए सभव नहीं होता क्या यह सब? मैंने न कोशिश की और न रुचि दिखाई। अब जब पिछड़ गया हू तो अकेला, अनुपयोगी और व्यर्थ महसूस करते हुए तनावग्रस्त हो गया हू। अकारण होने वाली थकान, खीझ, झुंझलाहट, असतोष, ऊब की जड़ में यह अव्यक्त तनाव ही तो नहीं है?
भीड़ में रहना मुझे पसन्द है। अब एकान्त चुना है मैंने। लोग तारीफ करे। मेरी स्थिति और हैसियत के सन्दर्भ में उनमें ईष्र्याभाव हो। विरोध करने वालों को निस्सहायता तथा कमतरी का अहसास कराने के लिए जरूरी खेल खेलता रहू। कहीं जाऊं तो सामान्य आदमी जैसा व्यवहार न किया जाये। कहू, चाहे न कहू मगर इससे मुझे सुख मिलता है। एकान्त में रहकर आजकल जो कुछ मैं करता हू वह जीवन भर की साध लगी होगी, किन्तु सचमुच मेरा भ्रम है। सब कुछ छोड़कर केवल पढ़ता रहू क्योंकि चाहते हुए भी कभी पढ़ने के लिए समय नहीं निकाल पाया, यह वहम है। मुझे बाहर निकलना होगा इन भ्रमों और वहमों से। वही करना होगा जो मुझे सर्वाधिक प्रिय है। न सही कर्मचारी सघ की राजनीति किन्तु मोहल्ले की विकास समिति है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए काम करने वाली सस्थाएं है। सेवानिवृत्ति कर्मचारी सगठन है। क्यों दूर जाता हू? कालोनी के प्रवेश मार्गो पर दरवाजे लगवाकर सुरक्षा की दृष्टि से प्रहरी नियुक्त करने की चर्चा कई महीनों से विकास समिति में की जा रही है। धन जुटाकर इस व्यवस्था को लागू करने की बात बन नहीं पा रही है। सकेत मात्र देने की देर है, विकास समिति वाले हाथों-हाथ लेंगे। भले ही बासठ का हो गया हू किन्तु मैं बूढ़ा नहीं हुआ हू अभी। न मन से और न तन से।
मैं खड़ा हो जाता हू। जोर से आवाज लगाकर पत्नी को कहता हू, ''सुनती हो, मैं विकास समिति के अध्यक्ष से मिलने जा रहा हू।''
[भगवान अटलानी]
डी-183, मालवीय नगर,

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